रविवार, 28 जून 2015

आपातकाल की आहट : मरती खबरें,जलते खबरनवीस




"लोमड़ी पेड़ के नीचे पहुंची. उसने देखा ऊपर की डाल पर एक कौवा बैठा है, जिसने मुंह में रोटी दाब रखी है.लोमड़ी ने सोचा कि अगर कौवा गलती से मुंह खोल दे तो रोटी नीचे गिर जाएगी. नीचे गिर जाए तो मैं खा लूं.
लोमड़ी ने कौवे से कहा, ‘ भैया कौवे ! तुम तो मुक्त प्राणी हो, तुम्हारी बुद्धि, वाणी और तर्क का लोहा सभी मानते हैं. मार्क्सवाद पर तुम्हारी पकड़ भी गहरी है.वर्तमान परिस्थितियों में एक बुद्धिजीवी के दायित्व पर तुम्हारे विचार जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी. यों भी तुम ऊंचाई पर बैठे हो, भाषण देकर हमें मार्गदर्शन देना तुम्हें शोभा देगा,बोलो मुंह खोले कौवे!
इमर्जेंसी का काल था. कौवे बहुत होशियार हो गए थे. चोंच से रोटी निकाल अपने हाथ में ले धीरे से कौवे ने कहा – ‘लोमड़ी बाई, शासन ने हम बुद्धिजीवियों को यह रोटी इसी शर्त पर दी है कि इसे मुंह में ले हम अपनी चोंच को बंद रखें. मैं जरा प्रतिबद्ध हो गया हूं आजकल, क्षमा करें. यों मैं स्वतंत्र हूं, यह सही है और आश्चर्य नहीं समय आने पर मैं बोलूं भी.”
चालीस साल पहले आपातकाल के सामयिक काल को लेकर शरद जोशी ने जो व्यंग लिखा था आज फिर से प्रासंगिक हो गया है जब आपातकाल की आहटें धीमे से आती दिख रही है.जब सत्ता  अपने प्रतिष्ठानों को कमजोर करके प्रेस की आजादी और नागरिक स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध नजर आती नहीं दिख रही है. चालीस साल पहले जो रोटी कौवे को अपनी चोंच बंद रखने के लिए दी गई थी आज तक उनके मुंह में है, हालांकि अब इसके स्वरूप में परिवर्तन आ गया है.
चालीस साल पहले इंदिरा गांधी के ‘शॉक ट्रीटमेंट’ के प्रचार में ‘ऑल इंडिया रेडियो’ ने ‘ऑल इंदिरा रेडियो’ बनकर अपने हितों का बुरी तरह प्रयोग किया. मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने ‘मंडी में मीडिया’ में बताया है कि इसमें दूरदर्शन भी पीछे नहीं था-“दूरदर्शन का प्रयोग एक ओर जंहा इंदिरा गांधी की सकरात्मक छवि बनाने के लिए किया जाता रहा, वंही दूसरी ओर इसके जरिए संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम को प्रोत्साहित किया गया. इसी समय जयप्रकाश नारायण से जुड़े फुटेज ब्लैक आउट किए गए,इतना ही नहीं उस दौरान केवल उन्हीं सितारों की फ़िल्में दिखाई गई जिन्होंने आपातकाल का समर्थन किया. जनता जब आपातकाल के विरोध में रैली निकल रही थी तब दूरदर्शन रैली की बजाय ‘बॉबी’ फिल्म दिखा रहा था.”
आज भी आपातकाल से अलग तस्वीर दूरदर्शन और आकाशवाणी की की नहीं है,यह माध्यम तब भी सत्ता के अभिकरण के तौर पर काम करती नजर आ रही थी और आज भी है.पर एक खास परिवर्तन दिखाई देता है वो है कि निजी खबरिया चैनल भी अपनी तटस्थता को छोड़कर सत्ता का राग गाते नजर आ रहें हैं. इन चौबीस घंटों की खबरिया चैनल में खबरों की मौत हो रही है या कहें कि ख़बरों को मार दिया जा रहा है.इसको इन घटनाओं के संदर्भ में देखा-जाना जा सकता है.मुंबई के मलाड में जहरीली शराब पीकर सौ से अधिक लोगों की मौत की खबर को मार दिया गया क्योंकि विश्व योग दिवस का लाइव प्रसारण तानना जरुरी था. देश की आर्थिक राजधानी में सौ लोगों की मौत की खबरों को मार दिया गया क्योंकि उस राज्य में उनकी ही सत्ता है जो देश की मुख्यधारा की मीडिया को झुकने कह रहें हैं तो वो तलवे चाटने लगती है. क्या इतनी लोगों की मौत की खबरें प्राइम टाइम में बहस का विषय नहीं होनी चाहिए ? यह अघोषित सेंसरशिप का मामला ही दिखाई देता है जो अब यह तय नहीं कर रहा है कि क्या दिखाना है,बल्कि यह तय करती है कि क्या नहीं दिखाना है.
जिस तरह आपातकालीन दौर में सत्ता से टकराने का माद्दा रखने वाले पत्रकारों को जेलों की काल-कोठरी में बंद कर दिया गया था. उसी तरह आज के इस दौर में भी जगेन्द्र सिंह और संदीप कोठारी जैसे पत्रकारों की निर्मम हत्या की जा रही है. अगर यह आपातकाल की आहत नहीं है तो क्या है जंहा पत्रकारों को सत्य की रक्षा के लिए कोपरनिकस की तरह जलना-मरना मंजूर किया परन्तु भ्रष्ट सत्ता और उनके मान्यतायों को स्वीकार नहीं किया. आपातकाल में बिजली काटकर समाचारपत्रों की सेंसरशिप की जा रही थी,पर वर्तमान दौर में पत्रकारों को मारकर यह सेंसरशिप की जा रही है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है.
एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री आपातकाल पर ट्विट करते हैं कि – “हमें उन लाखों लोगों पर गर्व हैं जिन्होंने आपातकाल का विरोध किया जिनके प्रयासों से हमारे लोकतंत्र का ताना-बाना बचा हुआ है.एक विविधतापूर्ण उदार लोकतंत्र विकास की बुनियाद है,हम अपने लोकतांत्रिक आदर्शों और चरित्रों को और मजबूत बनाने के हर संभव प्रयास करें.” दूसरी तरफ ‘मुंह में राम,बगल में नाथूराम’ की तर्ज पर लोकतांत्रिक संस्थायों को कमजोर करने या खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है. जब मालेगांव विस्फोट मामले में विशेष वकील रोहिणी सालियन जब यह बताती है कि ‘नई सरकार के आने के बाद मालेगांव मामले में आरोपियों के प्रति नरम रुख के लिए दवाब पड़ रहा है.’ तो मीडिया इसको लेकर सरकार को कठघरे में नहीं खड़ा करती कि आखिर कैसे न्याय प्रणाली को सत्ता अपने हितों के लिए प्रयोग कर रही है.आखिर मीडिया इसको लेकर सतर्क क्यों नहीं है ? क्या इसलिए क्योंकि इसमें साध्वी प्रज्ञा,कर्नल पुरोहित जैसे लोग शामिल हैं ? क्या यह इतनी ही सामान्य सी घटना होती अगर कोई अक्षरधाम कांड के आरोपियों को लेकर इस तरह की नरमी बरतने की बात कही होती ?
                              ‘अबकी बार,पारदर्शी सरकार’ का दावा करने वाली मोदी सरकार लोकतांत्रिक संस्थायों को कमजोर करने की कोशिश करने की भरसक कोशिश की. एक साल तक ‘मुख्य सतर्कता आयुक्त’ और ‘मुख्य सूचना आयुक्त’ की नियुक्ति स्थगित रही,परन्तु मीडिया ने मौन साधकर सत्ता को सहयोग ही किया. सूचना के अधिकार को कमजोर करने की कोशिश जारी है. इसको समझने के लिए नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री के काल को देखा जा सकता है कि किस तरह सत्ता का केंद्रीयकृत व्यवस्था द्वारा लोकतांत्रिक संस्थानों के क्षरण में सहयोग किया. वर्तमान मोदी सरकार भी सत्ता के उसी केन्द्रीयकरण की तरफ इशारा करती है जंहा राज्य के चुनाव भी मोदी के मुखौटे पर ही लड़ा जा रहा है. दरअसल यह सहकारी संघवाद का के ताबूत में कील जैसी साबित होगी. यह उसी दौर की याद दिलाता है जंहा ‘इंदिरा इज इंडिया’ थी. जंहा ‘सुषमा-वसुंधरा-पंकजा-स्मृति-शिवराज’ पर लगे आरोपों के लिए इनकी अलग क्लीन चिट जांच प्रणाली विकसित की है. यह वैचारिक दोगलापन को बताता है जंहा ललित मोदी की प्रियंका-राबर्ट से मुलाकात की जांच तो केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो से होनी चाहिए और सुषमा-वसुंधरा के सहयोग-मुलकात की जांच पार्टी करेगी.
                                  न्यायपालिका को प्रभावित करके पंगु बनाने की धीमी साजिश से भी आपातकाल की आहट को महसूस की जा सकती है. उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का किसी राज्य का राज्यपाल बनना, नरेंद्र मोदी के करीबी अमित शाह का मुकदमा लड़ने वाले वरिष्ठ वकील उदय ललित  का उच्चतम न्यायलय में न्यायधीश बनना, उच्चतम न्यायलय के वर्तमान मुख्य न्यायधीश एच.लक्ष्मीनारायणस्वामी दत्तू के खिलाफ भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बाद भी सरकार के द्वारा कोई जांच न होना और मीडिया के द्वारा इसको कोई मुद्दा न बनाना यह इंगित करता है कि शायद यह गठजोड़ आपातकाल की तरफ न फिर एक बार ले जाए. आडवानी के अनुसार – “ भारत की राजनितिक व्यवस्था में आज भी आपातकाल की आशंका है,भविष्य में नागरिक स्वतंत्रता के निलंबन की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है.मौजूदा समय में लोकतंत्र को कुचलने वाली ताकतें मजबूत हैं.” क्या यह आशंका सच होगी ? जिस तरह लोकतंत्र के चारो खंभे एक साथ एक दुसरे के लिए खड़े दिखाई दे रहें हैं यह खतरनाक आयामों की तरफ संकेत करता है.
आपातकाल के दौरान जो रोटी कौवे के चोंच में डाली गई थी यह यह रोटी आज भी दी जा रही है.पहलाज निहलानी और गजेन्द्र चौहान ने ‘अबकी बार,मोदी सरकार’ में सहयोग किया था. अब उन कौवे को पद की रोटी दी गई है. यह सत्ता के अभिकरणों को सत्ता के साथ करने की कवायद है. कला-संस्कृति-साहित्य  को कभी राजसत्ता का आश्रय नहीं लेना चाहिए,परन्तु वर्तमान परिदृश्य में यह लक्ष्मणरेखा विलीन होती नजर आती है.
सेवंती नैनन के “नेहरु वॉज ए विजनरी, लालबहादुर शास्त्री इज ए रिविजनरी एंड इंदिरा गांधी ए टेलीविजनरी” कथन में यह जोड़ा जा सकता है कि “नरेंद्र मोदी इस ए मिडियानरी.” मोदी ने जिस तरह मीडिया का उपयोग किया है वो कुछ कुछ वैसा ही जैसा राजेन्द्र माथुर ने लिखा कि ‘आजादी के दीया को बुझाने का काम किया.’

गुरुवार, 7 मई 2015

मीडिया पार्टनर,तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है ?


मौत एक त्रासदी है,पर भारतीय मुख्यधारा की मीडिया में मौत एक पैकेज है जो टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट अर्थात् टी.आर.पी बढ़ाने का एक माध्यम है. मीडिया में दिखाई जाने वाली मौत की घटना की भी एक जिंदगी होती है. पर मीडिया के भूगोल में सभी मौत एक पैकेज नहीं होती है बल्कि उसमें भी भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जाता है.यह भेदभाव कभी क्षेत्रीय समीपता के कारण होती है तो कभी जाति-धर्म-विचारधाराओं की टकराहट के रूप में उभर के आती है. मौत जाति-वर्ग-धर्म भेद नहीं करता है पर भारतीय मुख्यधारा की मीडिया यह भेद करता है. यह सिंड्रोम बताता है कि मीडिया में मौत भी बेची  जा सकती है.पिछले कुछ दिनों में मीडिया ने मौत पर अलग-अलग तरह से  तानने का प्रयास किया है.मीडिया में कश्मीर में होने वाली मौत दिल्ली में होने वाली मौत से कैसे अलग हो जाती है ? मीडिया में आंध्रप्रदेश-तेलंगाना-कश्मीर-पूर्वोतर भारत में होने वाली मौत क्यों नहीं सवाल खड़ा कर पाती है ? विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानों की खबर क्यों नहीं किसान आत्महत्या के मुद्दे को उतने प्रमुखता से उभार नहीं पाता,जो दिल्ली में होने वाली किसान आत्महत्या की खबर से हो जाता है. दिल्ली में जेसिका लाल की मौत और निर्भया को लेकर जो शुरू होता है वो छतीसगढ़ की लड़की कड़ती पेंटी और माडवी रामा को लेकर शुरू क्यों नहीं हो पाता है ? क्या मीडिया,मौत में बाजार का एंगल भी देखता है. वंचितों,किसानों और दलित-आदिवासीयों के लिए मीडिया में वो सकारात्मक सरोकार नहीं दिखता है.वो सकारात्मक हस्तक्षेप नहीं दिखता है जो बदलाव के लिए जरुरी हो.शर्मीला इरोम का अनशन अन्ना हजारे के अनशन के सामने उतनी चर्चा का विषय नहीं बनता.
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में घटने वाली किसान गजेन्द्र सिंह के आत्महत्या की एक घटना  राष्ट्रीय शर्म का विषय बन जाता है,पर प्रतिदिन लगभग औसतन 40 किसानों की आत्महत्याओं की खबर सुर्ख़ियों में भी नहीं आ पाती है. विदर्भ में एक ही परिवार की कई लोगों के अपने खेत में ही जीवन लीला समाप्त करने की खबर पर्याप्त चर्चा का विषय नहीं बन पाती.  किसानों की आत्महत्याओं की खबर तब तक मात्र एक संख्या थी जब तक दिल्ली में ‘मौत लाइव’ नहीं हुई,परन्तु इस लाइव मौत ने भी मुद्दे को गुमराह कर दिया. मीडिया ने गजेन्द्र सिंह की आत्महत्या के मुद्दे के मूल कारण को ही गायब कर दिया. किसानों के आत्महत्याओं के कारण खोजने के बजाए मीडिया इस मुद्दे पर प्राइम टाइम में तानने लगे. इन बहस के मुद्दे से किसान गायब हो गया,उनकी आत्महत्या के कारण गायब हो गए. आखिर प्रश्न यह उठता है कि अगर दिल्ली की मीडिया तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया है तो इसके ‘नेशन’(नेशन वांट्स टू) की परिधि में विदर्भ क्यों नहीं उतनी प्रमुखता से आ पाता ? दिल्ली में किसान की आत्महत्या के बाद ही यह टेलीविजन में क्यों प्रमुखता से बताया-दिखाया जाता है ?
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए लोगों की सच्चाईयों को लाने का काम करती हुई मीडिया नहीं दिखती. तेलंगाना पुलिस के द्वारा मोहम्मद इजहार खान,मोहम्मद हनीफ़ खान,बकरुदीन अहमद,सैयद अमजद अली और मोहम्मद ज़ाकिर के फर्जी मुठभेड़ की जो कहानी अब तक सामने आई है उसमें मीडिया क्यों नहीं इसके गुनाहगार तय करने का काम करती दिखती है. विश्व कप क्रिकेट में हार के गुनाहगार तय करने वाले इस मामलों में कैसे इतने संवेदनहीन हो जातें हैं ? जिस तरह की तस्वीरें अब तक सामने आई है उससे यही पता चलता है कि यह योजनाबध तरीके से इनकी हत्या की गई है. पुलिस ने इन युवकों की पहचान सिम्मी के आतंकवादी के रूप में की थी. अगर यह सिम्मी से जुड़े थे तो भारतीय न्यायालय इनकी सजा तय करती. जिस तरह के कहानी तेलंगाना पुलिस ने गढ़ी है वो क्यों नहीं मीडिया द्वारा शक के घेरे में लाया जाता है. “करोड़ो लोगों के न्याय के लिए दिन-रात चैनल लड़ते रहते हैं” का  दावा करने वाले लोग क्यों खामोश हो जातें हैं ?
आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा चितूर जिले के सेशाचालम के जंगलों में तमिलनाडु के 20 लकड़हारे की हत्या भी कोई बड़ी खबर नहीं बन पाती है. यह मात्र एक आंकड़ा बन कर न्यूज रूम में घूमता रहता है. ‘सच दिखातें हैं हम’ का भ्रम तब टूटता हुआ नजर आता है जब मीडिया इस मामलें अपनी उतनी सकरात्मक हस्तक्षेप करती हुई नहीं दिखती है. पुलिस के इस तर्क में क्यों नहीं उससे सवाल करती है कि ‘लकड़हारे से आत्मरक्षा के लिए उनको गोली चलानी पड़ी’ उन लकड़हारों से जो अपने साथ सिर्फ कुल्हाड़ी से लैस थे.एक भी लकड़हारे को जिन्दा पकड़ने की कोशिश क्यों नहीं की गई ? इस तरह के सवाल क्यों नहीं खड़े किये गए. क्यों नहीं कश्मीर के ट्राल में खालिद मुज्जफ्फर की सेना द्वारा मौत को सकारात्मक तरीके से बताया-दिखाया जाता है. जबकि दुसरे न जाने कितने मुद्दों पर धागे से टेंट बनाने का काम करती रही है . क्यों नहीं किशोर छात्र सुहैल अहमद सोफी की हत्या को खबर बनाया जाता है. काश इन खबरों की जिंदगी भी उन नकारात्मक खबरों की तरह होती जो मीडिया तानती रहती है ? काश इन खबरों को भी उसी शिद्दत के साथ बताया-दिखाया जाता जैसे कि मसरत आलम के सभा में पाकिस्तानी झंडे लहराये जाने की खबर को ताना जा रहा था. भारतीय मीडिया एक बार फिर कश्मीरी लोगों को यह बताने-जताने में नाकाम रही कि दिल्ली की मीडिया उनकी अपनी मीडिया है जो उनके दुःख-दर्द की  हमदर्द है. मसरत आलम के सभा में चंद पाकिस्तानी झंडे उनको दिखाई देते रहें पर जम्मू-कश्मीर की वो 65 प्रतिशत आवाम नहीं दिखी जिसमें भारत की व्यवस्था में अपना मतदान दिया. मसरत आलम के सभा में चंद झंडे से आपका देशभक्ति शक के दायरे में आ जाता है पर 65 लोगों के वोट के सामने कमजोर लगने लगता है,आखिर क्यों ? कश्मीर के मुद्दे को लेकर मीडिया क्यों एक अलग नजरिये से देखता है? क्यों चंद लोगों की वजह से कश्मीरियों की देशभक्ति शक के घेरे में ली जाती है ? क्यों नहीं मीडिया उन 13 कश्मीरी छात्रों के मुद्दे को उठाता है जिसे ‘रोहतक इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट’ से निकाल दिया जाता है क्योंकि “प्रधानमंत्री स्पेशल स्कोलरशिप स्कीम” के पैसे समय पर नहीं पहुंच पाती है ? मीडिया नसीर सोफ़ी की तरफ से क्यों नहीं सवाल खड़े करता है कि परीक्षा से पहले इस तरह निकाले जाने के बाद उसका भविष्य क्या होगा ? सुबह-सवेरे हर आदमी के भविष्यवाणी के लिए फुर्सत के क्षण निकालने वाले मीडिया से मैं पूछना चाहता हूं कि ‘इस तरह की सकरात्मक खबरों का भविष्य क्या है ?’
मसरत आलम के रिहाई के मामले में मीडिया एक बार यह बताने में असफल रहा कि रिहाई के आदेश माननीय उच्चतम न्यायालय ने दिए थे,यह भ्रम फ़ैलाने का प्रयास किया गया कि कि इसकी रिहाई मुफ़्ती मोहम्द की सरकार ने की है.
सरकार दरअसल में मीडिया का प्रयोग अपने एजेंडे को सही बताने में करती रही है. शुभ्रांशु चौधरी की किताब “Let’s Call Him Vasu” (उसका नाम वासु नहीं) में इस पहलु की भी पड़ताल करती है कि किस तरह संचार माध्यमों में सलवा जुडूम के अत्याचारों और हमलों के बारे में चुप्पी साधे रहती है,वो सिर्फ पार्टी के आक्रमण की खबरों को प्रमुखता से छापती है.इन्होनें बताया है कि किस तरह लड़कियों को घरों से ले जाकर बलात्कार करते हैं और उनकी हत्या करके फर्जी नक्सली बनाकर मीडिया में पेश करते हैं. “जब मैंने साथी पत्रकारों को सलवा जुडूम के अत्याचारों के बारे में बताने और उनसे भी इस बारे में लिखने को कहा तो मुझे काफी विरोध का सामना करना पड़ा.स्थानीय मीडिया में मेरे प्रति रोष बढ़ता गया.अफजल खान ने उनके बारे में लिखा तो उसे पीटा गया और उसे महीनों घर से दूर रहना पड़ा” पर जब मीडिया किसी एजेंडे का वाहक बन जाता है तो यह खतरनाक हो सकता है.
मीडिया को जनसरोकारों के लिए होना चाहिए. वंचित-पीड़ित-शोषित-दलित लोगों के लिए काम करना होगा.आप छोटे-छोटे मुद्दों पर तानते  हो,जबकि इन के मुद्दों पर खामोश क्यों हो जाते हो ? मीडिया के नेशन में सबको लेकर चलना होगा. ‘सूट-बूट की मीडिया’ के आवरण से बाहर निकलना होगा. इस ‘नेशन वांट्स टू क्नोव’ में नेशन की परिधि में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और कच्छ से लेकर कुमकी तक के क्षेत्र शामिल होने चाहिये, बिना किसी वर्ग-जाति-संप्रदाय-क्षेत्र से भेदभाव के बिना. तभी मीडिया  ‘आप की आवाज’ बनकर ‘देश का धड़कन’ बनेगा और ‘सबसे आगे’ रहकर ‘खबर हर कीमत पर’ देने की कोशिश होगी तभी का ‘सच जिंदा रहेगा’ .  






बुधवार, 1 अप्रैल 2015

हैलो मीडिया,मैं हाशिमपुरा बोल रहा हूं....



हैलो मीडिया,मैं हाशिमपुरा बोल रहा हूं.अगर शायद आपको याद होगा तो मैं वही हाशिमपुरा बोल रहा हूं जंहा हमारी सरकार ने ही मेरे अपने लोगों को मारकर नहरों में फेक दिया था.और 28 सालों के बाद भी किसी को गुनाहगार नहीं ठहराया जा सका.शायद आपको याद नहीं होगा वैसे भी हमारे बारे में आपकी याददाश्त कमजोर ही रहती है.और हाँ मैं कोई जेसिका लाल जैसी दिल्ली की सोशलाईट तो हूं नहीं कि मुझको न्याय दिलाने की मुहिम शूरू करोगे.मैं मेरठ के एक छोटे से कस्बेनुमा हाशिमपुरा हूं.
हालांकि मेरे बारे में आपकी ज्यादातर खबरें नकारात्मक ही रहती है.जब कोई गुनाह होता है तो हमारे धरम-मजहब से जोड़ देते हो,और सारे लोगों को गुनाहगार बना देते हो.जब हमारे बारे में कोई बुरी खबर होती है तो तुरंत आप बड़ी-बड़ी पैकेजों में बनाकर दिखाते-बताते हो,जब हमारी बेगुनाही की बात होती है तो आप टिकर और फीलर में जगह देते हो. पिछले साल की ही तो एक घटना है,सोलह मई   2014 को 2002 के अक्षरधाम आतंकी हमले के सभी छह आरोपियों को  सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया. आदेश में शीर्ष अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा था -"अभियोजन पक्ष की कहानी हर मोड़ पर कमजोर है और गृह मंत्री ने नॉन अल्पिकेशन ऑफ़ माइंड (Non Application Of Mind) का प्रयोग किया.पर आप लोगों ने उस समय के गृहमंत्री (गुजरात) नरेंद्र दामोदर भाई मोदी से यह क्यों नही पूछा कि आपने उनके साथ ऐसा क्यों किया ? क्या सिर्फ इसलिए क्योकिं हमारी पहचान भारतीय से पहले मुसलमान की है. जब आतंकी हमले के घंटे दो घंटे के अंदर पुलिस मनचाहे लोगों को शिकार बनाकर उठा ले जाती है तब तो आप(मीडिया) आरोपियों को आतंकी करार देते हुए और उनके शहर को आतंक का अड्डा बताते हुए पहले पन्ने पर कागज काले (हरे रंग से) किये रहते हैं या स्पेशल रिपोर्ट में धागे से तम्बू बनाने/तानने की जुगत में दिन रात लगे होतें हैं. हमारे जन्मस्थान में जाकर घरवालों के मुंह में लगभग माइक घुसेड़ कर पूछते हैं की कैसा लगता है ? लेकिन बरसों बाद जब वही आरोपी बाइज्ज़त बरी हो जाता हैं तो अव्वल तो वह इस ख़बर को लेता ही नहीं और अगर लेता भी है तो अंदर के पन्नों में एक कॉलम में या टेलीविजन में टिकर पर किसी औपचारिता की तरह.ऐसा क्यों करतें हैं आप ?क्या यही है इस बेगुनाही की कीमत ? आखिर हमें ही क्यों बार-बार अपने बेगुनाही का सबूत देना पड़ता है ? सोलह मई 2014 को किसी मीडिया ने उस समय के गृहमंत्री (गुजरात) से सवाल क्यों नहीं पूछा की उन बेगुनाह भारतीयों का क्या होगा ? कौन देगा इसके जवाब ? भारतीय क्रिकेट टीम द्वारा मैच के हार एक पर “गुनाहगार कौन” नाम से स्पेशल कार्यक्रम ‘तानते’ हैं,अब आपमें (मीडिया में) इतनी मिशनरी ग्लूकोज बची है जो इन छ लोगों के गुनाह को निर्धारित और जबावदेही तय करने वालों के गुनाहों का हिसाब लिया जा सके. अब क्यों नहीं किसी में यह हिम्मत बची की बारह साल काल कोठरी में गुजारे इस लोगों के लिए गुनाहगार तय करे. क्या इनके द्वारा काल कोठरी में गुजरे गए बारह साल की कीमत एक क्रिकेट मैच से भी काम है? जो चैनल भुत-प्रेतों का टी.आर.पी तय करता है,बिना ड्राइवर की कार चलवा सकता है,स्वर्ग की सीढी बना सकता है, क्या वह इन भारतीयों के गुनाहगारों से सवाल भी नहीं पूछ सकता ? अगर नहीं तो तुम वाचडॉग नहीं बन सकते सिर्फ डॉग बन सकते हो. जो राजसत्ता और नई पूंजी के सामने अपनी दूम हिलाते रहने को विवश हो. रीढविहीन मीडिया आज सत्ता के चरण-चारण वंदना कर रही है और दिख/बिक  रही है. परन्तु मोहमद सलीम,अब्दुल कैयुम,सुलेमान मंसूरी की आंसू मीडिया को नहीं दिख रहा है.नहीं दिखा उस शहवान का दर्द जिसके अब्बा पिछले सालों से जेल में हैं. सलीम अपनी बेटी से दस साल बाद मिल सका क्योकिं उसके जेल जाने के बाद यह पैदा हुई थी,उस बच्ची के बचपन को अब्बू की जगह को कौन भरेगा?
शायद आपको एजाज मिर्जा भी याद नहीं होगा ? यह वही है जो ‘रक्षा अनुसंधान एवं विकास संघठन’,भारत सरकार में कार्यरत जूनियर रिसर्च फेलो था. जब मार्च,2013 में बेगुनाह साबित करके रिहा किया गया तो मुख्यधारा की मीडिया ने उसके बेगुनाही में एक भी पैकेज नहीं चलाया. पुलिस द्वारा जब बंगलौर कांड के आरोप में एजाज को गिरप्तार किया और बाद में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संघठन,भारत सरकार ने फेलोशिप रद्द कर दी तब इस नौजवान का अंतरिक्ष वैज्ञानिक बनने का सपना इसके आंखों में ही रह गया. पर छोटे-छोटे मुद्दों पर हिसाब मांगने वाले आप लोगों ने इस मासूम के  सपने के टूटने और बिखरने का हिसाब नहीं मांगा. “कोई करोड़ो दर्शकों से पूछे कि उन्हें न्याय दिलाने के लिए न्यूज चैनल(ल्स)कैसे दिन-रात लड़तें हैं” का दावा करने वाले आपके इन करोड़ों लोगों के न्याय दिलाने में एजाज को कैसे भूल गए ? जब यह आरोपी बनाया गया था तब आप लोगों ने कैसे चीख-चीख कर दुनिया को बताया था, कि इस मासूम से चेहरे के पीछे के शैतान को देखो,अब क्या हो गया था ?यह दोहरापन क्यों अपनाया जाता है,की जब कोई मुस्लिम बेगुनाह होकर आता है तो आपके चैनल और अख़बारों में जगह नहीं पाता जितना जब वो तथाकथित आतंकवादी आरोपित होने पर होता है? कौन एजाज मिर्जा के सपनों को पूरा करेगा? इस मीडिया को हरेक मुसलाम आतंकवादी ही दिखता है.जब आरोपित होने पर जब कोई मुस्लमान आतंकवादी दिखता है परन्तु वही जब उस आरोप से मुक्त हो जाता है तो वो बेगुनाह क्यों नहीं दिखाई देता ? क्या हर मुस्लिम को आतंकवादी के रूप में प्रायोजित करने का कोई एजेंडा बनाया है तुमलोगों ने?
हैलो मीडिया !!! सुन रहे हो न मुझे या फिर किसी कमर्शियल ब्रेक पर चले गए? मैं एक बात पूछना चाहता हूं जब हम आरोपी बनाए जातें हैं तो सबसे पहले हम मुसलमान क्यों बना दिए जातें हैं ? जब 72 साल की नन के साथ कोई बलात्कार करता है तो वह कोई फलाना व्यक्ति उस धर्म का क्यों नहीं माना जाता जबकि हमारे मामले में मजहब को क्यों जोड़ा जाता ?चर्च पर होने वाले हमले आपराधिक मामले हो जातें हैं और मंदिरों पर होने वाले हमले आतंकवादी कारवाई क्यों मान ली जाती है ?सच-सच बताओ मीडिया,क्या आपका भी कोई मजहब है? क्या आपकी भी कोई जात क्या है? क्या मीडिया की भी कोई जाति होती है ? यदि नहीं तो मीडिया में मुस्लिमों के मुद्दे क्यों नहीं सार्थकता से उठती हुई दिखाई/सुनाई देती है ? भुत-प्रेत,राखी-मीका,जुली-मटुकनाथ पर पैकेज बनाने वाला मीडिया क्यों हमारी  अनदेखी करता है? जो कुछ सरोकारों के साथ चलने का दावा करते हैं उनके प्रयास भी महज रस्म अदायगी क्यों होते हैं? जब आरोपी बनाए जातें हैं तो हम ब्रेकिंग न्यूज होतें हैं और जब बेगुनाह साबित कर दिए जातें हैं तो क्यों नहीं ब्रेकिंग न्यूज बनाते ?आखिर क्यों आप (मीडिया) सवालों के घेरे में आ गयें है.क्यों नहीं मुस्लिमों के प्रति आपका रवैया अभी भी बदला है? न किसी बेगुनाह की रिहाई को लेकर सवाल उठाये जातें हैं और न ही कोई पैकेज बनाएं जातें है? क्यों नहीं इनके सकारात्मक खबरें पर्याप्त ध्यान खीच पाती हैं? क्यों नहीं  मुस्लिम महिलायों की खबरें जगह पाती है? क्यों नहीं मुस्लिमों की बेगुनाह रिहाई खबर बन पाती है? भारतीय मीडिया क्यों नहीं  इनकी तरफ अपने आप को खड़ा पाता है?मुस्लिमों को सिर्फ और सिर्फ आतंकवादी के रूप में ही क्यों कवर दी जाती है? इनके बेगुनाही के मुद्दे को जगह क्यों नहीं दी जाती है ?
             आप छोटे-छोटे मुद्दों पर “तानते” हो,जबकि इन के मुद्दों पर खामोश क्यों हो जाते हो? क्रिकेट में हार के मुद्दे पर ऐसे पैकेज बना रहें हो जैसे कोई राष्ट्रीय संकट आ गया हो,परन्तु जब अक्षरधाम कांड के आरोपी बेगुनाह रिहा हुए तो आपने पैकेज बनाकर उनको वैसी तत्परता से आपने तब दिखाया/बताया था जब उनको पुलिस आतंकबादी बता रही थी. इन मुद्दों पर क्यों नहीं कोई पैकेज बनती दिखती रही है ? क्यों नहीं अक्षरधाम कांड के आरोपी के समर्थन में कोई उसके बेगुनाही की कीमत का हिसाब मांग रहा है ? क्यों नहीं एजाज मिर्जा के टूटे सपनों का हिसाब सरकार से मांगा ?
मीडिया,आखिर कब तक हमलोगों को मुसलमान होने से पहले भारतीय होने के लिए सफाई देनी होगी ? लोकतंत्र के इस चौथे खंबे में कब तक हाशिमपुरा और इन जैसे तमाम हाशिमपुरा के लोगों के दर्द को जगह मिलेगी ? जेसिका लाल की जंग आपने लड़ी थी,काश आप मेरी भी जंग लड़ो,मुझको भी न्याय दिलाओ.





बुधवार, 11 मार्च 2015

ग्रासरूट मीडिया से सशक्त होती महिलायें



सशक्तिकरण एक बहुआयामी धारणा है और इसका संबंध लोगों की सामाजिक उपलब्धियों,आर्थिक और राजनीतिक सहभागिता से जुड़ा होता है.इसके साथ ही सशक्तिकरण एक सतत प्रक्रिया भी है और इसकी कोई अंतिम सीमा भी नहीं.कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण रूप से सशक्त नहीं हो सकता है.जटिल और गतिशील प्रकृतिके कारण किसी भी वैकासिक अध्धयन में सशक्तिकरण को परिभाषित करना और उसको मापना एक चुनौती है.महिलायों के मामले में तो यह और भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि महिलाओं के साथ दीर्घकाल से भेदभाव होता रहा है.
           महिला सशक्तिकरण की परिभाषायें संसाधनों पर नियंत्रण या शक्ति हासिल करने(भौतिक और वित्तीय)और महिलाओं के जीवन की गुणवत्ता निर्धारित करने वाले निर्णय लेने की क्षमताओं पर बल देती है.महिला सशक्तिकरण की कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं है.विभिन्न अध्ध्यनो में लक्ष्यों और क्षेत्र के आधार पर महिला सशक्तिकरण को परिभाषित किया गया है”   सामान्य अर्थ में कहा जा सकता है की नीति निर्णय या निर्माण की क्षमता से युक्त होना  ही सशक्तिकरण है.इसके आभाव का न केवल महिलाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है बल्कि इसका असर पूरे परिवार और समाज पर भी पड़ता है. सशक्तिकरण एक सतत प्रक्रिया भी है.महिलायों के मामले में तो यह और भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि महिलाओं के साथ दीर्घकाल से भेदभाव होता रहा है. इस भेदभाव को कम करने के लिए समावेशी विकास की अवश्यकता के उद्देश्यों को प्राप्त  करने हेतु सरकार ने लैंगिक बजट का प्रावधान किया है ताकि असमानता को दूर किया जा सके.क्योंकि नारी अस्तित्व से ही मानवता का विश्वास जीवित है.
  आंद्रे बिताई ने अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करते हुए लिखा है कि सशक्तिकरण सामाजिक रूपांतरण से संबंधितहै,जिसमें आमूलचूल परिवर्तन की व्याख्या सामान्य आम लोगों के संदर्भ में की गई है.यह राजनीतिज्ञों,विशेषज्ञों और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में विकासित व्यक्तियों की अपेक्षा आम लोगों के पुनरुत्थान के विषय में है 
 इस अर्थ में सशक्तिकरण की अवधारणा एक लक्ष्य की प्राप्ति का साधन भी है एवं अपने आप में साध्य भी,क्योंकि भिन्न-भिन्न परिस्तिथियों में इसका भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग किया जाता है.इसमें भिन्नता और तरलता भी है
वास्तव में सशक्तिकरण के विचार को मानव अधिकारों से लिया गया है.इस अर्थ में मानव अधिकारों की अवधारणा का एक विस्तृत अर्थ है.इसके अंतर्गत मूलभूत आवश्यकताओं,आर्थिक सुरक्षा,क्षमताओं के विकास,निपुणताओं का निर्माण और सम्माननीय जीवनयापन आदि को सम्मिलित किया गया है.महिला सशक्तिकरण का अभिप्राय महिलायों के सामाजिक पुनरूत्थान से संबधित है.इस प्रकार सशक्तिकरण का विचार राजनैतिक,आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक है.
 महिलायों के सशक्तिकरण का तात्पर्य उन्हें अधिक शक्ति या सत्ता दिया जाना है अर्थात महिला को अधिक सुविधापूर्वक कार्य देने के लिए उनमें चेतना और उन क्षमतायों का विकास किया जाना ताकि जीवन के हर क्षेत्र में अपनी सहभागिता निभा सके.
वर्तमान परिदृश्यों में मीडिया एक प्रभावशाली साधन और संसाधन बनकर उभरा है.इसके माध्यम से महिलाएं सशक्त हो रही है,क्योंकि मीडिया सूचना का एक माध्यम है,और आज के दौर में सूचना एक शक्ति है. जनपक्षीय सरोकारों से लैस होकर खबर लहरिया और नवउदयम ने साबित कर दिया है की ग्रामीण महिलाओं को सशक्त करने में इसकी क्या भूमिका हो सकती है.सामाजिक परिवर्तन लाने की दिशा में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है परन्तु आज की मुख्यधारा का मीडिया नई पूंजी और राजसत्ता का दलाल बन गई है.विकास के क्षेत्र में सूचना का सबसे अधिक महत्त्व होता है,बिना सूचना के किसी भी क्षेत्र में विकास संभव नहीं हो सकता.विकास योजना का मुख्य उद्देश्य मानव विकास तथा लोगों द्वारा जीवन यापन का उच्चतर स्तर हासिल करना ताकि समावेशी विकास हो सके.इसके लिए गरीबों,हाशिये पर रह रहें लोगों को विकास के लाभों और अवसरों के अधिक समान वितरण और बेहतर रहन-सहन के वातावरण व सशक्तिकरण की जरुरत है.
 महिला विकास एक संवेदनशील विषय है जिसे पूरी गंभीरता के साथ देखना होगा.इस गंभीर दायित्व को मीडिया को भी स्वीकार करना होगा.महिला सशक्तिकरण के नाम पर जितनी भी योजनाएं बनी उसका लाभ इस देश की औसत और सामान्य महिला को नहीं मिला है.इसलिए मीडिया की भूमिका बड़ी है क्योंकि इसकी पहुँच अधिकतम है.

खबर लहरिया और महिला सशक्तिकरण
‘खबर लहरिया’हिन्दी मिश्रित बुन्देली बोली में प्रकशित हिने वाला एकमात्र भारतीय भाषायी पाक्षिक समाचार पत्र है जिसे 8 ग्रामीण गरीब दलित महिलायों द्वारा चित्रकूट (उत्तर प्रदेश)से प्रकाशित किया जाता है इसकी सहायता निरंतर ट्रस्ट(नई दिल्ली) द्वारा की जाती है.2002में ग्रामीण महिलायों के समूह द्वारा यह प्रारंभ किया गया यह पत्र चित्रकूट और बांदा के 300 से अधिक गाँवों में पढ़ी और सुनी जाती है.खबर लहरिया स्थानीय भाषा में स्थानीय आवश्यकताओं और सवेदनाओ से युक्त ग्रामीण पत्रकारिता की एक नई पहल है जो हाशिये पर खड़ी दलित और पिछड़ी वर्ग की महिलायों द्वारा संचालित की जाती है.
ग्रामीण पत्रकारिता में खबर लहरिया जनपक्षधरता का पर्याय बन चुका है.आज की मुख्यधारा की मीडिया के सामने जंहा लगातार बढते मुनाफे और आर्थिक वृद्धि का दबाव है दुसरी ओर न्याय,विकास और लोकतांत्रिक आग्रह के लक्ष्य के साथ वैकल्पिक मीडिया के रूप में खबर लहरिया पहचान बनाने में सफल रहा है.जंहा मुख्यधारा की मीडिया कुछ खास लोगों के लिए अथाह लाभ हेतु काम करती है वन्ही सभी के न्याय को लेकर खबर लहरिया ग्रामीण क्षेत्रों में वैकल्पिक मीडिया का सार्थक निर्वाह कर रही है.लोकतंत्र,विकास और न्याय के पक्ष में खबर लहरिया की बढती भूमिका ने ग्रामीण पत्रकारिता को व्यापक जनस्वीकृति दिलवाई.
खबर लहरिया को प्रारंभ करने के विचार की बात पर निरंतर ट्रस्ट शालिनी जोशी का कहना था कि जब निरंतर में यह बात स्थापित हो चुकी थी कि एक अखबार की जरुरत है,और यह संभव है कि यहीं की महिलाओं को इस अखबार को निकालने की प्रक्रिया से जोड़ा जा सकता है.कुछ औरतें साक्षरता की ओर बढ़ी थी,हमको लगा कि यह भी उस बात को सशक्त करेगा की उनकी साक्षरता को कैसे कायम रखा जाए.तो यह हमें लगा कि यह एक तरीका है जिसमें हम औरतों के साक्षरता को आगे विकास करने के लिए मंच दे सकते है और एक ऐसा मंच जो निरंतर चलता रहें.
खबर लहरिया में प्रकाशित होने वाली सामग्री को तैयार करने में ग्रामीण महिलायों की भूमिका होती है.क्षेत्रीय स्तर पर जो सामग्री तैयार होती थी वह इन गरीब ग्रामीण औरतों के लिए होती थी पर इनको कोई और लोग तैयार करते थे,शहर में बैठे लोग यह तय करते थे कि यंहा के लोग क्या पढ़ना चाहते है,महिलायों के लिए कौन सी सामग्री  सही सामग्री है.इस स्थिति में खबर लहरिया के माध्यम से यह तय हुआ की उनकी बीच की सामग्री को उनकी बीच के लोगों द्वारा यह तय किया जायेगा की कौन सी सामग्री ज्यादा महत्वपूर्ण है.
इस अखबार में काम करने वाली महिलायों के लिए दोहरी चुनौती रहती है.एक तरफ उनको घरेलू दायित्व का निर्वाह करना होता है दूसरी ओर ‘खबर लहरिया’ के प्रति प्रतिबद्धता भी होती है.फिर भी महिलायें पत्रकारिता के तरंगों को विकास से जोड़ रही है.मुख्यधारा की मीडिया के स्थानीय संस्करणों में भी ग्रासरूट की खबरें नहीं आ पति है जबी स्थानीय मुद्दों को ‘खबर लहरिया’ महत्वपूर्ण स्थान देता है.
खबर लहरिया ने मानिकपुर गाँव से 8 किलोमीटर दूर सुखरामपुर गाँव में जिसकी जनसंख्या 600 थी में टी.बी. की बीमारी की रिपोर्टिंग सबसे पहले करके प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया था.इसके बाद स्वास्थ्य प्रशासन ने समुचित इलाज की व्यवस्था कर कई लोंगों को बीमारी से मुक्त किया.
खबर लहरिया ने भरतकूप चित्रकूट में अवैध खनन की जानकारी देते हुए लिखा एक साल पहले तक यह भरतकूप का पहाड हरा-भरा हुआ करता था,यंहा के पत्थर की खुदाई ‘हिंदुस्तान 19सीमेंट कंपनी’ ने अगस्त 2004 से शुरू करवाया.इस खुदाई से यह पहाड़ मिटटी का ढेर बन कर रह जाता,यंहा तक की यंहा के किसानों के खेत बर्बाद हो रहें थे. इस गंभीर मामले की खबर सबसे पहले इसी अखबार में छपी और इसका असर हुआ.                                

नव उदयम और महिला सशक्तिकरण
चित्तूर(आन्ध्रप्रदेश)की 6 गरीब ग्रामीण महिलायों ने महिलायों से संबद्ध मुद्दे को एक आवाज देने के लिए तेलगू भाषा में न्यूजलेटर की शुरूआत की.इनका मानना था कि इनको सूचना से सूचित करके सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है.आज नवोदयम 750प्रति से 30000प्रति तक पहुँच गया है.वर्तमान में इसके पाठकों की संख्या 2 लाख है.इस पत्रिका में समाचार संकलन से लेकर ले आउट डिजायन परिकल्पना का काम महिलायों द्वारा किया जाता है.इस मासिक पत्रिका में घरेलू मुद्दों तथा विशेष विषयों पर आधारित मुद्दे भी होते हैं.इस पत्रिका से जुड़ी इन अर्धशिक्षित महिलायों को समाचार संकलन और समाचार संपादन,यंहा तक कि वीडियो फिल्म बनाने के लिए भी प्रशिक्षित किया गया है.यह महत्वपूर्ण है कि हाशिये की आशिक्षित/अर्धशिक्षित महिलायों ने आंध्रप्रदेश में इस मूक क्रांति को प्रारंभ किया है.
नवउदयम, नव और उदयम से बना है,नव का अर्थ नया और उदयम का अर्थ उदय से है.महिलायों के सपनों को नई ऊँचाई देती नवउदयम नाम की सामुदायिक पत्रिका जो महिलायों के लिए,महिलायों के द्वारा तथा महिलायों की संकल्पना को पूरा करती है.इस पत्रिका का संपादन,प्रकाशन,वितरण और विपणन महिलायों के द्वारा ही की जाती है,यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का बेहतर उदाहरण है. इस पत्रिका से संबद्ध कोई महिला संभ्रांत तबके या विश्वविद्यालाय की उपाधिधारी नहीं है.इनमें से किसी ने भी पत्रकारिता की डिग्री नहीं ली है.सभी ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं,इनमे से किसी को अंग्रेजी नहीं लिखनी आती नहीं पढनी,परन्तु इस पत्रिका का संचालन ही नहीं बल्कि विकास के नए आयाम को स्पर्श कर रही है.    
यह सामुदायिक पत्रिका सरकार और ग्रामीण महिलायों के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में उभरकर सामने आई है.इसके माध्यम से सरकार अपनी सूचनायों के प्रवाह को ग्रामीण महिलायों की ओर प्रेषित करती है ताकि महिलाओं को सरकारी योजनायों का लाभ मिल सके.जिससे महिलायें अपना विकास कर सके.दूसरी ओर इसके माध्यम से सरकार महिलायों की समस्या से अवगत हो सके.14यह नवउदयम परियोजना विश्व बैंक गरीबी निवारण कार्यक्रम का एक भाग है.इस न्यूजलेटर का पहला अंक सूचना द्वारा सशक्तिकरण की बात करती थी, जो 15अगस्त 2000 को प्रकाशित हुई थी.इनका मुख्य उद्देश्य गावं के लिए समाचारपत्र निकालना था.इसके लिए चित्तूर जिले के 6 ग्रामीण गरीब दलित महिलाएं तिरुपति में एकत्र हुई. ‘सशक्तिकरण के लिए सूचना’ को आधार बनाकरनवउदयम’ एक न्यूजलेटर के रूप में प्रारंभ हुई.इसके चार उद्देश्य थे----
1.ग्रामीण गरीब महिलाओं को उनकी आवाज देना
2.ग्रामीण महिलायों द्वारा समाचार संकलन करना
3.सूचनायों तक गरीब ग्रामीण महिलायों की पहुँच
4.पत्रकारिता को विकास के लिए साधन बनाना.
 न्यूजलेटर से प्रारंभ होकर यह पत्रिका 8 पृष्ट की पाक्षिक पत्रिका के रूप में परिवर्तित हो गई.प्रारंभ में यह 750प्रति प्रकाशित होती थी,अब यह 24 पृष्टों की मासिक पत्रिका हो गई जिसकी 30हजार प्रतियाँ प्रकाशित होती है.वर्त्तमान में इसके पाठकों की संख्या 2 लाख तक पहुँच गई है.इसके रिपोर्टर जो ग्रामीण क्षेत्र की महिलायें हैं जिन्होंने पत्रकारिता का सारा कार्य सीखा.इसमे समाचार संकलन,लेखन,संपादन और लेआउट डिजायन शामिल है.6 महिलायों द्वारा प्रारंभ किया गया इस पत्रिका में आज 10 स्टाप रिपोर्टर और 20 सहयोगी बन गए हैं.सामुदायिक समन्वयक और संघमित्र(इंदिरा क्रांति पाठ्य कार्यक्रम की ग्राम स्तरीय कार्यकर्ता)के माध्यम से इस पत्रिका की सदस्यता के लिए पाठकों को प्रोत्साहित किया जाता है.ये पत्रिका के सुचारू रूप से संचालन के लिए विज्ञापन भी लाती है.पत्रिका के तकनीकी और वित्तीय मुद्दों से संबद्ध निर्णय कोर समूह लेती है.नवोदयम योजना आयोग की 9 सदस्यों में  6 पत्रिका की संस्थापक सदस्य तथा 3 जिला समाख्या की होती है.इसकी अध्यक्षता संपादिका होती है.
 यह पत्रिका नशाबंदी के मुद्दे पर,ग्रामीण क्षेत्रों में ऋणग्रस्तता के समस्या पर यह पत्रिका अशिक्षित महिलायों में बड़े पैमाने पर जागरूकता फैला रही है.जनवरी 2010 में इस पत्रिका ने शिवरात्रि के अवसर पर हिने वाले बाल-विवाह को मुद्दा बनाया था.इस पत्रिका ने बाल विवाह की बुरे के खिलाफ लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया.यह यंहा की पुरानी परम्परा है कि शिवरात्रि के दिन बाल-विवाह होने से दीर्घायु होता है क्योंकि इस रात्रि को ‘देवेदु पिल्ली’(भगवान का विवाह)होता है.इस अवसर पर प्रतिवर्ष 2000बाल-विवाह होता था.इस परम्परा के विरुद्ध पत्रिका ने बाल-विवाह की बुराइयों को उजागर करके चेतना फ़ैलाने का काम किया."
नवोदयम ने 7 महिलाओं को 10माह का वीडियो पत्रकारिता का कोर्स करवाया.इन महिलायों ने अब तक 100 से ज्यादा वृतचित्र का निर्माण किया.यंहा तक कि इन महिलाओं द्वारा निर्मित वीडियो का उपयोग बड़े टेलिविजन नेटवर्क द्वारा किया जाता है,जो इनके राजस्व का स्रोत है.इनके द्वारा बाल-विवाह पर बनी वृतचित्र का प्रदर्शन गाँवों में किया जाता है.इसके माध्यम से जागरूकता फैलाया जाता है.नवउदयम की महिलाएं न केवल पत्रकरिता के माध्यम से बल्कि ग्रामीण स्थानीय जनता से उनकी स्वास्थ्य,घरेलू हिंसा से संबद्ध समस्याओं पर चर्चा करती है.इसके साथ ही लड़कियों को स्कूल जाने तथा बाल-विवाह न करने पर बल देती है.
हाशिये की महिलायों द्वारा प्रारंभ की गई यह पत्रिका आज सार्थक पत्रकरिय हस्तक्षेप कर रही है जो मुख्यधारा की मीडिया नहीं कर पा रही है.