शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

समाचार वही जो व्यापार बढ़ाये

मीडिया बहुलता:सरोकार या सनसनी
वर्तमान प्रिंट मीडिया की प्रवृति को बाजारवादी शक्तियों ने भी प्रभावित किया है. ‘मीडिया का अंडरवर्ल्ड’ में दिलीप मंडल ने बताया है कि किस तरह विज्ञापन और बाजार मीडिया को निर्णायक रूप से नियंत्रित करने लगा है. मैकब्राइड कमीशन का मानना था कि ‘राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संचार के प्रवाह पर बाजार और व्यावसायिक हितों के बुरे असर को कम किया जा सके’. परन्तु मीडिया पर बाजार का असर लगातार बढ़ता जा रहा है. प्रांजलि बंधु ने भारतीय संचार माध्यम में बताया है कि बिड़ला समूह के ग्वालियर रेयान की फैक्टरी के कारण कालीकट के पास मावूर में चेलियार नदी के प्रदुषण के मामले को 1999 में इंडियन एक्सप्रेस के कोझिकोड संस्करण में प्रमुखता से उठाया. उसके बाद बिड़ला समूह ने विज्ञापन न देने की धमकी दी परिणामत: समाचारपत्र ने इस मामले को फिर नहीं उठाया. इस तरह देखा जा सकता है कि किस तरह विज्ञापन के दबाव के कारण जनसरोकारों के मुद्दे को कमजोर किया जा रहा है. इसी तरह का मामला “2009में कोरबा(छतीसगढ़) में बन रहे स्टरलाइट कंपनी के बिजलीघर की चिमनी गिरने से 40 लोगों की मौत की खबर की राष्ट्रीय मीडिया में लगभग अनुपस्थिति एक चौंकाने वाली घटना है. इस बिजलीघर की चिमनी को बनाने का ठेका चीन की एक कंपनी के पास था. न्यूज वैल्यू के लिहाज से यह एक बड़ी खबर थी. विदेशी कंपनी के शामिल होने के कारण इस खबर का महत्त्व और भी ज्यादा था,लेकिन यह खबर राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता से नहीं आई. चिमनी गिरने की घटना की मीडिया में अनदेखी के साथ इस तथ्य को रखकर देखें कि स्टरलाइट और उसकी मूल कंपनी वेदांता बड़े विज्ञापनदाताओं में हैं और 2009-10 में इस कंपनी के पूरे पेज के विज्ञापनों की [पूरी श्रृंखला राष्ट्रीय मीडिया में आई है.” इस तरह कि प्रवृति प्रिंट मीडिया में प्रवेश कर गई है.
हाउ करप्शन इन द इंडियन मीडिया अंडरमाइंस डेमोक्रसी

‘पेड न्यूज सिंड्रोम’ की प्रवृति भी प्रिंट मीडिया में देखने को मिल रही है प्रेस परिषद् के अनुसार ‘कोई भी समाचार या विश्लेषण अगर पैसे या किसी और तरफदारी के बदले किसी भी मीडिया(इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट) में जगह पाता है तो उसे पेड न्यूज की श्रेणी में रखा जाएगा.” यधपि भारतीय प्रेस परिषद् ने चुनावों के कवरेज बारे में दिशा-निर्देश दिया कि  ‘प्रेस को किसी उम्मीदवार या पार्टी को आगे दिखाने के लिए किसी भी तरह का आर्थिक या अन्य लाभ नहीं लेना चाहिए. प्रेस के किसी उम्मीदवार या पार्टी द्वारा उया उनकी ओर से दिए जाने वाले आतिथ्य या सुविधा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.’ इसके बाद भी 2009 में यह बहुत बड़ी प्रवृति बनकर उभरी जिसने समाचार मीडिया को प्रभावित किया. फलत: परंजॉय गुहा ठाकुरता और श्रीनिवास रेड्डी की समिति गठित हुई परन्तु इनकी रिपोर्ट ‘हाउ करप्शन इन द इंडियन मीडिया अंडरमाइंस डेमोक्रसी’ कभी भारतीय प्रेस परिषद् द्वारा सार्वजानिक नहीं की जा सकी. यह संकेत करता है कि पेड न्यूज का बाजार कितना शक्तिशाली हो गया है.

मीडिया विविधता
‘मीडिया मोनोपोली’ के रचनाकार बेन वैग्डकियान का मानना है कि ‘आधुनिक लोकतंत्र में राजनीति और विचार के क्षेत्र में विविधता होनी चाहिए ताकि लोग उसके बीच चुनाव कर सके.इसके लिए जरुरी है कि लोगों तक समाचार, साहित्य,मनोरंजन और लोकसंस्कृति अलग-अलग और प्रतिस्पर्धी स्रोतों के जरिए पहुंचा’. वर्तमान परिवेश में यह विविधता देखने को मिलती है. 1982 में द्वितीय प्रेस आयोग के रिपोर्ट में ग्रामीण क्षेत्रों की खबरों का समाचारपत्रों में न होने के कारकों पर प्रकाश डालते हुए बताया था कि ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता, क्रयक्षमता और संचार की कमी मुख्य कारक हैं. परंतु वर्तमान प्रिंट मीडिया के परिदृश्य में यह पूरी तरह से परिवर्तित हो गया है. वर्तमान में लगभग 47 प्रतिशत प्रिंट मीडिया का हिस्सा लघुसमाचारपत्रों से आता है. इसने प्रिंट मीडिया में विविधता और व्यापकता का समावेश किया है. स्थानीयकरण की प्रवृति ने न केवल क्षेत्रीय विस्तार किया बल्कि विविधता का भी समावेश किया,जो नवोन्मेष को भी बताता है. जगदलपुर(छतीसगढ़)के सांध्य समाचार ‘हाइवे चैनल’ ने स्थानीय बस स्टैंड पर एक मेल बॉक्स रखा है जिसमें कोई भी अपनी समस्याओं को लिख कर अपनी खबर समाचारपत्र तक पहुंचा सकता है. बुंदेलखंड में समाज की हाशिये की महिलायों ने ‘खबर लहरिया’ के माध्यम से जनसरोकारों के मुद्दे को अपनी खबर बनाने का काम किया है तो आंध्रप्रदेश में ‘नवउद्यम’ के माध्यम से महिलायों ने समस्यायों को उजागर किया है. जयपुर से ‘उजाला छड़ी’ ने स्थानीय विकास को मुद्दा बनाया है तो देशबंधु और नवभारत ने छतीसगढ़ के स्थानीय विकास को समाचारपत्रों में स्थान दिलाई. प्रिंट मीडिया के स्थानीयता ने इसके स्वरूप को लोकतांत्रिकरण किया है.इसके परिणामस्वरूप ‘नागरिक पत्रकारिता’ का विकास हुआ. खबर लहरिया, नवउदयम, हाइवे चैनल इसी लोकतांत्रिक सहभागिता मीडिया सिद्धांत का प्रतिफल है. इसके साथ-साथ बड़े और मध्यम समाचारपत्रों के स्थानीय संस्करण से भी स्थानीयता को प्रिंट मीडिया में महत्त्व मिल रहा है. इसी स्थानीयता और लोकतांत्रिकरण के कारण प्रिंट मीडिया में गेटकीपर की शास्त्रीय अवधारणा कुछ हद तक खंडित हुई है. समाचारपत्रों की स्थानीयता प्रिंट मीडिया की नई उभरती प्रवृति में सबसे महत्वपूर्ण है.
मीडिया खड़ा बाज़ार में
विकास के मुद्दे को प्रमुखता न देने की नई प्रवृति प्रिंट मीडिया के वर्तमान परिदृश्य में देखने को मिलता है.  ‘द हूट’ पर प्रकाशित इंदिरा अकिजोम की शोध से यह प्रमाणित भी होता है कि देश की मुख्यधारा की समाचारपत्रों में विकास के मुद्दे सबसे कम महत्वपूर्ण मुद्दे के तौर पर उभर रहे हैं. द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, द इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, द हिंदू और द इकोनोमिक टाइम्स के अप्रैल-मई 2012 के समाचारों का परिमाणात्मक और परिणामात्मक अंतर्वस्तु विश्लेषण के आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि खेल, राजनीति और अपराध सबसे प्रमुखता से उठाये जाने वाले मुद्दे हैं. इन समाचारपत्रों में विकास को 0.68 -2.09%, कृषि को 0.29 -4.9%,पर्यावरण को 0.08 -1%, राजनीति 12.7-23%, खेल 1.1- 28.99% और अपराध 6 -13.04% को इस तरह प्रमुखता दी गई थी. 2009 में ‘सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’ द्वारा मुख्यधारा की प्रसारण मीडिया के एक अध्ययन में भी भास्कर राव और पी.एन.वासंती ने बताया था कि कृषि, शिक्षा स्वास्थ्य और पर्यावरण के मुद्दे सबसे कम उठाए जाने वाले मुद्दे हैं. इस तरह यह कहा जा सकता है कि विकास के मुद्दे का प्रमुख न होना न केवल प्रिंट मीडिया बल्कि समाचार मीडिया की प्रवृति है.
महात्मा गांधी के ‘अंतिम आदमी’ का आभाव भारतीय प्रिंट मीडिया में एक नई प्रवृति है. उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने भारतीय मीडिया से सवाल पूछे कि “क्या आम नागरिक की चिंता के विषयों पर मीडिया में सार्वजानिक बहस होती हैं? क्या हाशिए के लोगों, वंचितों और समाज के कमजोर तबकों के लोगों के सरोकार के लिए मीडिया में पर्याप्त स्थान हैं? क्या संविधान के सामाजिक और राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में हमारे मीडिया ने क्या योगदान किया है? भारतीय मीडिया में आम आदमी और उसके सरोकारों को कौन सा स्थान दिया जाता है यह पी. साईनाथ के इस व्याख्यान से पता लगता है “ 2007 मुंबई लक्मे फैशन वीक में कपास से बने सूती कपड़ों का प्रदर्शन किया जा रहा था लगभग इसी दौरान विदर्भ में किसान कपास की वजह से आत्महत्या कर रहे थे. इन दोनों घटनायों की सबसे बड़ी विडंवना यह है कि फैशन वीक को कवर करने के लिए जंहा कोई 512 मान्यता प्राप्त पत्रकार पुरे हफ्ते मुंबई में डटे रहे और कोई 100 पत्रकार रोजाना प्रवेशपत्र लेकर आते-जाते रहे. वंही विदर्भ में किसानों की आत्महत्या को कवर करने के लिए बमुश्किल 6 पत्रकार ही पुरे देश से पहुंच पाए.” मीडिया की इस नई उभरती संस्कृति में ‘समाचार वही जो व्यापार बढाए’ की अवधारणा ने न्याय, विकास, लोकतंत्र, किसानों-गरीबों-विस्थापितों की हित की बात करने इस परिदृश्य में नहीं दिख रहे हैं.
गंदा है पर धंधा है
 खोजी पत्रकारिता का आभाव प्रिंट मीडिया की एक प्रवृति उभरती दिख रही है. प्रिंट मीडिया में खोजी पत्रकारिकता का जो दौर इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू, ब्लिट्ज, जनसत्ता, संडे, रविवार, टेलीग्राफ, माया, इंडिया टुडे ने प्रारंभ किया था वो अब दिखाई नहीं देती है. खोजी पत्रकारिता में भाषाई समाचारपत्रों ने भी की बड़ी भूमिका निभाई थी जो सीमेंट घोटाला, भागलपुर आंखफोडवा कांड और भोपाल त्रासदी के तौर पर देखा जा सकता है. परन्तु वर्तमान दौर में खोजी पत्रकारिता प्राय: कम हो रहे हैं,तहलका और इंडियन एक्सप्रेस कुछ हद तक इस तरह की पत्रकारिता देखी जा सकती है. 


शुक्रवार, 10 जून 2016

प्रिंट मीडिया का भविष्य और भविष्य का मीडिया



1984 ई. में अमेरिकी फिल्म ‘घोस्टबस्टर्स’ में एक सेक्रेटरी पात्र जब वैज्ञानिक से पूछती है कि ‘क्या वे पढना पसंद करते हैं?. तब वैज्ञानिक पात्र कहता है ‘प्रिंट इज डेड’. इस पात्र का यह कहना उस समय हास्य का विषय था परंतु वर्तमान परिदृश्य में प्रिंट मीडिया के भविष्य पर सवाल खड़ा किया जा रहा है. 2008 ई. में जेफ्फ़ गोमेज़ ने ‘प्रिंट इज डेड’ पुस्तक लिखकर प्रिंट मीडिया के विलुप्तप्राय होने की अवधारणा को जन्म दिया तो रोस डावसन ने तो समाचारपत्रों के विलुप्त होने की समयावधि चार्ट ही बना डाला. इसके अनुसार 2017ई. में संयुक्त राज अमेरिका से लेकर 2040 ई. तक विश्व से समाचारपत्रों के प्रिंट संस्करण विलुप्त हो जाएंगे.
रोस डावसन द्वारा बनाई समय तालिका जिसमें समाचारपत्रों को विलुप्तप्राय होने की बात की गई है.

रोस डावसन का मानना है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट की तेज गति से विकास के कारण ऐसा संभव होगा. यह भविष्य के लिए एक मनोरंजक उपकल्पना लग सकती है . वैश्विक रिपोर्ट देखने से रोस डावसन की आशंका निर्मूल साबित होती दिखती है.  
 वान-इफ्रा की रिपोर्ट ‘वर्ल्ड प्रेस ट्रेंड 2014’ के अनुसार विश्व में 534 मिलियन समाचारपत्र प्रतियों का प्रकाशन प्रतिदिन होता है, जो पिछले वर्ष से 2% ज्यादा है. राजस्व के मामले में प्रिंट संस्करण ने 163 बिलियन $ की राजस्व प्राप्त किया जो कुल राजस्व का 93.7% है.
वैश्विक समाचारपत्र उधोग के राजस्व की प्रवृति
 राजस्व को इन आंकड़ों के माध्यम से समझा जा सकता है.
प्रिंट बनाम डिजिटल संस्करण के राजस्व में अंतर
प्रिंट और डिजिटल संस्करण में राजस्व का हिस्सा
डिजिटल और प्रिंट संस्करण के राजस्व को भी इसके माध्यम से देखा जा सकता है कि लगभग 93% हिस्सा प्रिंट माध्यम से आता है. इससे यह कहा जा सकता है कि प्रिंट मीडिया के विलुप्त होने की अवधारणा एक रोचक उपकल्पना मानी जा सकती है.
क्षेत्रीय समाचारपत्रों के आंकड़े देखने से यह पता चलता है कि एशिया और लैटिन अमेरिका में प्रिंट संस्करण विकास की ओर अग्रसर है.
 
क्षेत्रीय समाचारपत्र उद्योग 
 भारतीय समाचारपत्रों के पंजीयक कार्यालय द्वारा जारी किये गए ‘प्रेस इन इंडिया-2014-15’ के अनुसार 18.99% वृद्धि हुई है. फिक्की–के.पी.एम.जी.‘इंडियन मीडिया एंड इंटरटेनमेंट इन्डस्ट्री रिपोर्ट 2015’ के अनुसार 8.3% वृद्धि दर प्रिंट मीडिया में हुई है. इन रिपोर्टों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत में प्रिंट मीडिया का भविष्य अभी बेहतर है. 
समाचारपत्रों के बढ़ते कदम

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की 71वें राउंड की रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2014 तक 71% ग्रामीण भारत और  86% प्रतिशत शहरी भारत साक्षर था. साक्षरता के विकास की संभावनाओं को समाचारपत्रों के विकास के साथ जोड़कर देखा जा सकता है. ज्यों-ज्यों साक्षरता का विकास होगा समाचारपत्रों को पाठक मिलेंगे. 2011 की जनगणना के अनुसार 80% से कम साक्षरता वाले राज्यों की संख्या 15 है जिनमें हिन्दी ‘हार्टलैंड’ के राज्यों की संख्या अधिकतर है. ग्रामीण भारत के मध्यवर्गीय निवासियों की क्रयशक्ति में वृद्धि होने के कारण भी समाचारपत्रों की मांग बढ़ेगी. संचारविदों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीविजन के विकास ने समाचारों के प्रति जिज्ञासा को और बढाया है जिसकी पूर्ति समाचारपत्रों से ही संभव होती है.  
समाचारपत्र में विकास या वृद्धि

 इंटरनेट प्रौद्योगिकी के विकास ने प्रिंट मीडिया के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है परंतु यह भी देखना उचित होगा कि भारत में इस माध्यम से कितनी चुनौती मिलती है. भारत में इंटरनेट प्रयोक्ता की कुल अनुमानित संख्या जुलाई 2016 तक 462 मिलियन होगी, जो जनसंख्या का 34% होता है. भारत में प्रिंट को इस माध्यम से चुनौती मिलती नहीं दिख रही है.
क्या इंटरनेट भारत में समाचारपत्रों को खा जाएगा ?
 इस तरह यह कहा जा सकता है कि भारत में रोव डावसन की विलुप्तप्राय होने के समयकाल से डरने की जरुरत नहीं है.
प्रिंट मीडिया का भविष्य अभी बेहतर है और इस मीडिया का भविष्य हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाई पत्रकारिता पर निर्भर लगती है.
हिन्दी हार्टलैंड है भविष्य
 
क्षेत्रीय भाषा में विकास की संभावना
रॉबिन जेफ्री ने समाज में प्रिंट मीडिया के विकास हेतु तीन चरणों की बात की है –‘रेयर’, ‘एलिट’ और ‘मास’. भारत ने ‘मास’ चरण में प्रवेश ही किया है अत: प्रिंट मीडिया का भविष्य भारतीय परिदृश्य में सुरक्षित है.

शुक्रवार, 27 मई 2016

ग्रामीण महिलाओं की आवाज़ : सामुदायिक रेडियो



महिलाओं की जुबां : रेडियो बुंदेलखंड

विकास की क्रिया में जनसंचार माध्यमों का योगदान सर्वविदित है. 70 के दशक में हरित क्रांति इसका सशक्त उदाहरण है. विकास की प्रक्रिया को गतिशील और प्रभावी बनाने हेतू यह आवश्यक है कि सूचनायों का सम्प्रेषण स्थानीय जरूरतों के अनुसार हो ताकि प्रेषक और प्रापक के बीच लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित की जा सके.  सामुदायिक रेडियो में एक प्रभावी और सार्थक सूचना सम्प्रेषण का एक सशक्त माध्यम बनने की पूरी क्षमता है. ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक रेडियो बहु उद्देश्यों के साथ काम कर सकता है. इस लेख में यह दिखने का प्रयास किया गया है की किस तरह रेडियो के माध्यम से महिलायों ने अपने को सशक्त बनाने का प्रयास किया.
सामुदायिक रेडियो का मतलब एक छोटे से समुदाय या कस्बे की जरूरतों के मुताबिक रेडियो पर किया जाने वाला प्रसारण है, जिसमें वंहा के लोगों की भागीदारी भी होती है. वैसे तकनीकी अर्थ में जाएँ तो असल में सामुदायिक रेडियो वह है जिसके कार्यक्रम किसी विशेष समुदाय के लिए बनाया जाए और जिन्हें बनाने का काम स्वंय समुदाय ही करे. वर्तमान परिवेश में यह मीडिया जनसंचार का प्रभावी माध्यम बन गया है. यह लोकतंत्रिक अभिव्यक्ति का एक सशक्त जरिया बन गया है जो  ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर बदलाव का हथियार बन सकती है क्योंकि अपने लिए कार्यक्रम बनाने के लिए समुदाय को न तो अपनी भाषा बदलनी पड़ रही है न ही पहचान.
भारत विविधताओ का देश है, यह विविधता जीवन के प्राय: हर क्षेत्रों दिखता है. सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक यंहा तक की भौगोलिक विविधता इसका सौंदर्य है. इस विविधता का परिणाम बहुपक्षीय रहा है. इसके फलस्वरूप कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, हस्तशिल्प व्यवसाय में विविधता दिखलाई पड़ती है. इन विषमताओं को दूर करने और समाज के हर तबके को विकास के समान अवसार उपलब्ध करने और विकास की मुख्यधारा से जोडने हेतु आवश्यक है कि सूचना समर्थित विकास की प्रक्रिया लोकतंत्रिक और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक संचालित हो ताकि लक्ष्य समुदाय की पहचान और विकास कार्यक्रम में सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित हो सके.इस प्रक्रिया में सूचना और जनसंचार माध्यमों की भूमिका अति महत्वपूर्ण हो सकती है. वर्त्तमान में ऐसा ही एक माध्यम सामुदायिक रेडियो के रूप में हमारे सामने आया है जो मीडिया में लोकतंत्रिक भागीदारी का सर्वोतम उदाहरण बन सकता है.
 आकाशवाणी के बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की अवधारणा एवं व्यावसायिक एफ.एम. रेडियो की गलाकाट प्रतिस्पर्धा से अलग सामुदायिक रेडियो क्षेत्रीय तथा स्थानीय आवश्यकता के अनुरूप विकासपरक सूचना सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम है.इसका  प्रसारण क्षेत्र सीमित होता है. इसमें कार्यकमों की संरचना स्थानीयता के अनुरूप तथा उदेश्य विकास समर्थक होता है.प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों का स्वरुप गैर-व्यावसायिक और विकास के मुद्दों यथा-कृषि, वानिकी, पशुपालन, विद्युत, जल-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय कौशल आदि को समर्पित होता है. स्थानीय  बोली-भाषा में कार्यक्रम का प्रसारण स्थानीय लोगों का कार्यकर्म निर्माण में भागीदारी सामुदायिक रेडियो की अन्य विशेषता है. मनोरंजन, विज्ञापन और समाचार के कार्यक्रम सामुदायिक रेडियो में लगभग प्रतिबंधित होते है. दरअसल सामुदायिक रेडियो का पूरा जोर सामयिक,प्रासंगिक और स्थानीय मुद्दों पर विकास समर्थित संचार करना होता है.
 सामुदायिक रेडियो को वैधानिक बनाने की प्रक्रिया का प्रारंभ 1990के दशक के मध्य में हुआ. फरवरी 1995में सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय में हवाई तरंगों को सार्वजनिक सम्पति घोषित कर दिया.इस निर्णय ने भारत में सामुदायिक रेडियो का रास्ता खोल दिया. किन्तु प्रारंभिक विकास काल में सामुदायिक रेडियो के संचालन की अनुमति सिर्फ शिक्षण संस्थानों को ही दी गई थी.
 “गैर-सरकारी क्षेत्र का पहला सामुदायिक रेडियो 15 अक्टूबर 2008को “रेडियो संघम” के नाम से पास्तापुर गाँव, मेडक जनपद, आन्ध्र प्रदेश में शुरू किया गया.इसका संचालन डेक्कन डेवलपमेंट सोसायटी द्वारा किया जा रहा है. इसका उद्देश्य इस क्षेत्र के 75 गांवों की महिला समूहों को विकासपरक सूचना देना है. आंध्रप्रदेश के मेडक जिले में दलित महिलायों के द्वारा सामुदायिक रेडियो प्रारंभ किया गया जो स्थानीय भाषायों में स्थानीय मुद्दों को उठाती है”.  आंध्रप्रदेश के मेडक जिले के जाहिराबाद में अशिक्षित महिलायों द्वारा सामुदायिक रेडियो प्रारंभ किया गया. इसमें घरेलू हिंसा, फसल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सूखा जैसे मुद्दों पर कार्यक्रम प्रसारित होते है. यह एक मात्र रेडियो स्टेशन है जो दलित महिलायों द्वारा संचालित की जाती है, जिन्होंने 10 वीं से अधिक की शिक्षा नहीं ली है. 2008 में प्रायोगिक तौर पर प्रारंभ की गई सामुदायिक रेडियो आज 30 कि.मी. के दायरे के 500 गांवो में प्रसारित हो रहा है.इसके विषयों में घरेलू हिंसा, फसल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सूखा शामिल है जो स्थानीय भाषा या बोली में होती है. रेडियो संघम’ शाम के एक घंटे का समय ‘केवल टी.वी.’ पर भी प्रसारित होता है जिसमें साक्षात्कार, गीत और नाटक प्रसारित किये जाते है. महिलायों का अपना रेडियो स्टेशन होना चाहिए,इसका विचार ‘डेक्कन डेवलपमेंट सोसायटी’ जो कि एक स्वंयसेवी संस्था थी,के माध्यम से आया. इसके बाद स्वंयसेवी संस्था ने दो महिलायों को रेडियो की तकनीकी प्रशिक्षण दिलवाई. रेडियो संघम में ए.नरसम्मा और जी.नरसम्मा पहली रेडियो प्रस्तोता बनी. अब तक 12  महिलायों को इस काम में प्रशिक्षित किया.
सामुदायिक रेडियो ‘संघम रेडियो’ नियमित प्रसारित होने वाले रेडियो से पूरी तरह अलग है. यह स्थानीय बोली का प्रयोग करते हैं जिसमें तेलंगाना, मराठी, कन्नड़, उर्दू का प्रयोग किया जाता है. जब ये महिलाएं रेडियो में काम नहीं कर रही होती तब ये महिलाएं खेतों में काम कर रही होती हैं. जी.नरसम्मा का मानना है कि ‘इसका संचालन व प्रबंधन पूरी तरह से सामुदायिक स्तर पर होता है. हमलोग बाहर से प्रशिक्षित विशेषज्ञों को नहीं बुला सकते हैं क्योंकि हमारी समस्या व मुद्दे उन लोगों को बेहतर तरीकों से समझ में नहीं आ सकते जो इस समुदाय से बाहर के हों. हमारे श्रोता इसके संदेश को ग्रहण करने में ज्यादा सक्षम होगा, जो हमारी भाषा में बोलेगा,  उस व्यक्ति के साथ जुडाव महसूस करेगा’.  पी.सुशीला जो रेडियो संघम में उदघोषक हैं का कहना है कि ‘महिलायें साक्षात्कार से संबद्ध उपकरण लेकर गांवों में जाती है. इन साक्षात्कारोंमें निम्न बातें शामिल होती है—यदि किसी किसान ने फसल के साथ कोई प्रयोग किया और वह बेहतर परिणाम आया तब उस विचार को समुदाय में बांटता है.’  इसके साथ-साथ यदि पंचायत सदस्य को कोई सूचना स्वास्थ्य या सफाई से संबद्ध में देना हो तो इसके माध्यम से देता है. यदि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र द्वारा महिलायों और नवजात शिशुयों से संबद्ध सूचनायों को प्रसारित करना हो तो इसी का प्रयोग किया जाता है.रेडियो किसानों को फसल से संबद्ध बातें स्थानीय बोली में प्रसारित करती है ताकि वह समझ सके.फसल की बुआई से लेकर उसको बेचने की सलाह भी दी जाती है. इन महिलायों के द्वारा ‘रेडियो संघम’के माध्यम से स्थानीय भाषा,संस्कृति और परम्परा का संरक्षण भी किया जा रहा है.इन महिलायों के पास स्थानीय गीत, कहानी, नाटकों का एक संग्रह तैयार हो गया है जिसका प्रसारण प्रति रात्रि 8 बजे होता है.इस रेडियो ने महिलायों में आत्मविश्वास की भावना दी है.
सरकारी क्षेत्र का एक अन्य सामुदायिक रेडियो “मध्य प्रदेश के जनपद ओरछा में ‘बुन्देलखंड रेडियो’के नाम से संचालित है. यह सामुदायिक रेडियो डेवलप्मेंट आल्टरनेटिव नमक संघटन द्वारा चलाया जा रहा है”. जिसका उद्देश्य बुन्देलखंड क्षेत्र के लोगों के विकास के विकल्पों की तलाश में सहायता हेतू सूचना उपलब्ध करना है. इस रेडियो का संचालन भी पूरी तरह से महिलायों द्वारा किया जाता है. इस प्रकार कहा जा सकता है की मीडिया के माध्यम से महिलाओं को सशक्तिकरण किया जा रहा है.  
विकास के क्षेत्र में सूचना का सबसे अधिक महत्त्व होता है.बिना सूचना के किसी भी क्षेत्र में विकास संभव नहीं हो सकता. विकास योजना का मुख्य उद्देश्य मानव विकास तथा लोगों द्वारा जीवन यापन का उच्चतर स्तर हासिल करना है इसके लिए गरीबों और हाशिये पर रह रहें लोगों के विकास के लाभों और अवसरों के अधिक समान वितरण और बेहतर रहन-सहन के वातावरण और सशक्तिकरण की जरूरत है.ऐसी अवधारणा है की ग्रामीण महिलायें जो की परिवर्तन हेतु उत्प्रेरक का कार्य कर सकती है को सशक्त करने की जरूरत है. विकास को समावेशी बनाने हेतु ग्रामीण महिलाओं द्वारा सार्थक पहल की परंपरा विकसित हो चुकी है.

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

भारतमाता बेजार रो रही है.


 
मकबूल फ़िदा हुसैन की कलाकृति

कंही भारतमाता की जय कहने पर पिटाई हो रही है(यह बात असत्य साबित हो गई है),तो कंही भारतमाता की जय नहीं बोलने पर पिटाई हो रही है. जब एक “टोपी” वाला कहता है कि भारतमाता की जय नहीं बोलेगा तो एक “दाढ़ी” वाला उसकी गर्दन काटने की बात कहता है पर जब यही बात एक “पगड़ी” वाला कहता है तो यह दाढ़ी वाला खामोश क्यों रह जाता है? क्या यह सेलेक्टिव विरोध नहीं है? अगर विरोध भारतमाता की जय नहीं बोलने को लेकर था तो टोपी और पगड़ी वालों ने समान बात की थी. दिल्ली में जो काम देशद्रोह की श्रेणी में आता है वही काम श्रीनगर में देशद्रोह की सीमा से अलग कैसे हो जाता है?
एक आदमी कहता है कि 'भारत माता की जय बोलना होगा' फिर वो आदतन बदल जाता है और कहता है 'भारत माता की जय थोपा नहीं जाना चाहिए' दूसरा आदमी कहता है कि ' कोई गर्दन पर छुरी भी रख दे,तो भी भारत माता की जय नहीं बोलूंगा. तीसरा आदमी कहता है 'अरे इस देश में कानून हैं, नहीं तो तेरी एक की क्या,हम तो लाखों की गर्दन काट सकते हैं.' चौथा आदमी कहता है कि 'भारतमाता की जय बोलना राष्ट्रवाद की एकमात्र परिभाषा होनी चाहिए. पांचवा आदमी कहता है ' सिख भारतमाता की जय नारा नहीं लगा सकतें हैं क्योकिं सिख धर्म में किसी भी रूप में महिला की पूजा नहीं की जाती'. छठा आदमी कहता है 'जो भारत माता की जय नहीं बोलता उसको भारत छोड़कर चले जाना चाहिए.'
माँ, अम्मी, बेबे, मातृ, मदर सभी एक ही अर्थ वाले समान शब्द हैं. वैसे ही जैसे कोई भारत माता की जय कहता है कोई जय हिन्द, कोई हिंदुस्तान जिंदाबाद,कोई मादर-ए-हिन्द. इस पुरे प्रकरण में लगता है कि एक समूह चाहता है कि 'तू कैसे नहीं बोलेगा तो दूसरा समूह कहता है तू बोलबा के तो दिखा.'
सुभाष चन्द्र बोस 'जय हिन्द' बोलते थे तो क्या आज उनसे भी 'भारत माता की जय' परिक्षण से गुजरना होता? जय भारत बोलने वाले क्या राष्ट्रवाद परीक्षण में असफल हो जाते.अगर भारत माता की जय ही राष्ट्रवाद की एकमात्र परिभाषा है तो फिर आधार कार्ड और पासपोर्ट की जगह भारत माता कार्ड लागू करनी चाहिए.जिसमें आप तीन बार भारतमाता की जय बोल दें और आप इस योजना के तहत भारत के नागरिक मान लिए जायेंगे.आपको किसी भी पासपोर्ट की जरुरत नहीं होगी.आप जब किसी बैंक जाए तो आप तीन बार माता की जय बोलें और आपको सारे कागजी प्रमाणों से मुक्ति मिल जाएगी.
एक विद्यालय ने कहा कि नामांकन के लिए उसे भारतमाता की जय बोलना होगा.परन्तु मेरा निवेदन यह है कि ‘अगर किसी ने अपनी उत्तर पुस्तिका में भारतमाता की जय लिखा है तो उसको कम से कम साठ प्रतिशत अंक देना अनिवार्य कर देना चाहिए. भारत सरकार को एक “भारतमाता आयोग” बनाना चाहिए जिसके द्वारा यह सुनिशचित किया जाए कि स्कूलों में  भारतमाता की जय बोलना अनिवार्य किया जाए. इस आयोग के तहत “भारतमाता जयकारा परिषद्” निर्मित की जाए. जयकारा शोध संस्थान बनाया जाए जिसमें यह शोध किया जाए कि इन जयकारों से देश में राष्ट्रवाद का स्तर कैसे बढ़ा है और इसको कैसे बढाया जाए.कुछ लोगों की मांग है कि भारतमाता की जय बोलने वाले इस देश में नहीं रह सकते हैं. कुछ लोग यह मांग सकते हैं कि जय हिन्द और हिंदुस्तान जिंदाबाद कहने वाले ही इस देश में रह सकते हैं. इस विवाद से निपटने के लिए एक सुपर आयोग बना दो.
इस सबके बीच भारतमाता जार-जार बेजार रो रही है.